अनाया तीसरे माले के छोटे से कमरे में रहती थी। खिड़की से शहर का पिछला हिस्सा दिखता था, जहाँ दीवारों पर पुराने पोस्टर चिपके रहते थे और शाम को पंछियों की जगह मोटरसाइकिलों की आवाज़ गूंजती थी। ये कमरा कभी उसे अस्थायी लगा था, जैसे किसी स्टेशन पर रुकी हुई सांस, पर अब वही कमरा उसकी दुनिया बन चुका था। दिन भर दफ्तर में लोगों से घिरी रहती, रात को लौटकर इसी कमरे में बैठ जाती। पहले ये खामोशी उसे काटने दौड़ती थी। उसे लगता था कि कोई है ही नहीं जो पूछे, दिन कैसा गया।शुरुआत में वो हर शाम किसी को फोन करती। कभी कॉलेज की सहेली, कभी दूर का रिश्तेदार, कभी कोई पुराना परिचित। बात खत्म होते ही भीतर और ज़्यादा खालीपन फैल जाता। जैसे किसी ने बुझी हुई राख को उलट दिया हो। उसे समझ नहीं आता था कि आवाज़ों से भरी बातचीत के बाद भी दिल और भारी क्यों हो जाता है। वो अपने आप से नाराज़ रहने लगी, सोचती थी कि शायद उसमें ही कोई कमी है।धीरे धीरे उसे ये दिखने लगा कि वो लोगों से बात इसलिए नहीं करती कि साझा करने को कुछ है, बल्कि इसलिए करती है कि अकेलेपन से डरती है। जैसे अकेले रहना कोई सजा हो। ये डर उसके भीतर एक आदत बन चुका था, जो हर शाम दरवाज़े की तरह खुल जाता था।*खामोशी से पहली मुलाकात:*एक रात फोन की बैटरी खत्म हो गई। चार्जर कहीं खो गया था। अनाया बिस्तर पर बैठी रही, अंधेरे में। न कोई स्क्रीन, न कोई आवाज़। शुरू में बेचैनी हुई। हाथ बार बार खाली जेब में जाता, जैसे वहाँ कोई अदृश्य फोन रखा हो। फिर थक कर वो खिड़की के पास बैठ गई। बाहर एक पीली स्ट्रीटलाइट जल रही थी, और उसके नीचे एक कुत्ता गोल घेरा बनाकर सो रहा था।उसने पहली बार ध्यान दिया कि उसका सांस लेना कितना धीमा है। छाती उठती है, गिरती है। ये पहले भी होता था, पर उसने कभी देखा नहीं था। मन में कई विचार आए, कल की मीटिंग, मां की तबीयत, किराए की तारीख। पर बीच बीच में एक खाली जगह भी उभरती थी, जैसे दो लहरों के बीच का पानी।उसे याद आया कि किसी ने कहा था, मौन से भागने की जरूरत नहीं, मौन से दोस्ती की जा सकती है। उस रात वो पूरी दोस्ती नहीं कर पाई, पर डर थोड़ा ढीला पड़ गया। जैसे कोई अनजाना दरवाज़ा आधा खुल गया हो।अगले दिन उसने चार्जर खरीदा, पर फोन पहले जैसा जरूरी नहीं लगा। वो समझ नहीं पाई कि क्या बदला है, पर कुछ बदला ज़रूर था।*अकेले रहने की कला:*अनाया ने छोटे छोटे प्रयोग शुरू किए। शनिवार की सुबह किसी को मैसेज नहीं करती। चाय बनाती, किताब खोलती, फिर बंद कर देती। कभी रंग पेंसिल से पुराने अखबार पर लकीरें खींचती। कभी बस बालकनी में खड़ी होकर लोगों को चलते देखती। उसे हैरानी होती कि पहले ये सब कितना बेकार लगता था, और अब इनमें एक हल्की सी मिठास घुल गई है।उसने महसूस किया कि जब वो किसी से उम्मीद नहीं करती कि वो उसके खालीपन को भरे, तब भीतर की बेचैनी थोड़ी शांत रहती है। जैसे कोई गड्ढा था, जिसमें वो रोज़ लोगों को गिराने की कोशिश करती थी, और अब उसने उस गड्ढे को देखना शुरू कर दिया था।एक शाम वो फर्श पर बैठी थी, पीठ दीवार से टिकी हुई। मन में फिर वही पुराना सवाल उठा, मैं किसके लिए जी रही हूँ। पहले इस सवाल के साथ डर जुड़ा होता था। आज बस सवाल था, बिना चीख के। उसने देखा कि सवाल उठ रहा है, और कोई जवाब देने वाला भीतर मौजूद नहीं है।उस रात उसने पहली बार अकेले खाने की मेज़ पर मोमबत्ती जलाई। सजावट के लिए नहीं, बस देखने के लिए कि लौ कैसे हिलती है। लौ की तरह ही उसका मन भी हिल रहा था, पर बुझ नहीं रहा था।*कृतज्ञता की धीमी साधना:*कुछ दिनों बाद उसने एक नई आदत बनाई। रात को सोने से पहले कमरे की लाइट बंद करके बिस्तर पर बैठती, आंखें खुली रहतीं। वो मन ही मन गिनती नहीं करती थी, बस देखती थी कि दिन में क्या क्या मिला। साफ पानी, दफ्तर में किसी का हल्का सा मुस्कुरा देना, सड़क पार करते समय किसी अजनबी का हाथ बढ़ा देना।शुरुआत में ये अभ्यास अटपटा लगा। जैसे खुद को बहलाना। पर धीरे धीरे उसमें कोई अभिनय नहीं रहा। वो सच में महसूस करने लगी कि सांस का चलना भी कोई मामूली बात नहीं है। दिल का धड़कना भी कोई कर्ज़ नहीं, एक उपहार है।एक रात उसने सोचा, अगर कल सब खत्म हो जाए, तो आज की ये साधारण चाय कितनी कीमती थी। इस सोच में न उदासी थी, न रोमांच। बस एक सीधी स्वीकृति थी। जैसे किसी ने भीतर से कहा हो, जो है, वही काफी है।इस कृतज्ञता में कोई भगवान का चेहरा नहीं था, कोई मंदिर की घंटी नहीं। बस एक अनाम एहसास था कि जीवन किसी को खुश करने की परियोजना नहीं, बल्कि अपने आप में पूरा घट रहा है।*ओवरथिंकिंग का पिघलना:*धीरे धीरे उसके विचारों की गति बदली। पहले वो हर वाक्य के पीछे सौ अर्थ ढूंढती थी। किसी का देर से जवाब आए, तो खुद को दोष देती। किसी का स्वर ऊँचा हो, तो रात भर उसी पर अटक जाती। अब भी विचार आते थे, पर उनमें वही पुरानी धार नहीं थी।उसने देखा कि विचारों को रोकने की कोशिश करना भी एक तरह की हिंसा है। जैसे नदी पर हाथ रखकर कहना, बहो मत। अब वो बहाव को देखती थी, उसमें कूदती नहीं थी।एक शाम ऑफिस से लौटते समय बस छूट गई। पहले वो खुद को कोसती, किस्मत को कोसती। उस दिन वो बस सड़क किनारे खड़ी रही। गाड़ियों की रोशनी, धूल, लोगों के चेहरे। भीतर हल्की थकान थी, पर क्रोध नहीं। उसने सोचा, अभी बस छूटी है, पूरी जिंदगी नहीं।वो हँसी भी, अपने ऊपर। ये हँसी किसी मज़ाक पर नहीं थी, बल्कि इस पर थी कि वो कितने साल छोटी छोटी बातों को पहाड़ बनाती रही।*अकेलेपन का बदलता रंग:*एक रविवार को उसकी सहेली अचानक मिलने आई। कमरे में बैठी, बातें हुईं, हँसी हुई। जाते समय सहेली ने कहा, तू बदल गई है। अनाया मुस्कुरा दी। वो खुद नहीं जानती थी कि कैसे बदली है, पर इतना पता था कि अब कमरे की दीवारें उसे नहीं दबातीं।उस रात वो फिर अकेली थी। वही कमरा, वही खिड़की, वही सड़क की आवाज़। पर भीतर कोई शिकायत नहीं थी। न ये सवाल कि कोई क्यों नहीं है, न ये उम्मीद कि कोई आए।उसे लगा जैसे अकेलापन कोई काली चादर नहीं, बल्कि एक साफ़ कागज़ है, जिस पर कुछ भी लिखा जा सकता है, या कुछ भी न लिखा जाए, दोनों ठीक हैं।उसने हाथ दिल पर रखा। धड़कन चल रही थी। बाहर शहर चल रहा था। दोनों के बीच कोई झगड़ा नहीं था।*भीतर का खेल का मैदान:*अब जब वो दफ्तर जाती, लोगों से मिलती, तो जुड़ाव का मतलब बदल गया था। पहले हर रिश्ता एक सौदा लगता था, मैं तुम्हें ध्यान दूंगी, तुम मुझे अपनापन दोगे। अब रिश्ता बस मिलना था, अलग होना था।कभी कोई तारीफ करता, तो वो खुश होती, पर उस खुशी में भूख नहीं होती थी। कभी कोई अनदेखा करता, तो हल्की चुभन होती, पर उससे पहचान नहीं बनती थी।उसने जाना कि जब भीतर अपने साथ बैठना आ जाए, तो दुनिया एक खेल का मैदान बन जाती है। जीत हार से नहीं, खेल से आनंद आता है।कभी कभी रात को उसे पुरानी बेचैनी याद आती। वो खुद से कहती, तुम भी कभी मेरी थी। अब आओ तो बैठ जाओ, जाओ तो भी ठीक।और खिड़की के बाहर वही शहर रहता, वही आवाज़ें, वही रोशनी। फर्क सिर्फ इतना था कि अब वो सब उसके खिलाफ नहीं थे, उसके भीतर भी नहीं थे। बस थे, जैसे सांस होती है, बिना पूछे, बिना मतलब के।अनाया मोमबत्ती बुझाती, बिस्तर पर लेटती। कमरे में अंधेरा फैल जाता। अंधेरे में कोई डर नहीं था, बस एक शांत फैलाव, जिसमें खुद को खोने का नहीं, बल्कि खुद के साथ ठहरने का अनुभव था।उसने आँखें बंद कीं। अंधेरा अब खाली नहीं लग रहा था। वो किसी गहरे पानी जैसा था, जिसमें डूबने का डर नहीं, बस ठहराव था। जैसे मन पहली बार किसी सवाल के बिना टिका हो। न ये जानने की जल्दी कि कल क्या होगा, न ये साबित करने की बेचैनी कि वो ठीक है।उसे लगा कि भीतर कोई बहुत पुरानी गांठ खुल रही है, बिना आवाज़ के, बिना दर्द के। जैसे कोई रस्सी जिसे सालों से कस कर बांधा गया हो, और अब वो खुद ही ढीली पड़ रही हो।उसने धीरे से सोचा, शायद खुशी का मतलब हँसना नहीं होता। शायद खुशी का मतलब ये होता है कि किसी को बुलाने की ज़रूरत न पड़े।कमरे में पंखे की आवाज़ चल रही थी। बाहर किसी ट्रेन की दूर की सीटी आई, फिर खो गई। इन आवाज़ों के बीच उसका होना बहुत साधारण था, और उसी साधारणपन में पहली बार कुछ पूरा लग रहा था।उसने करवट बदली।मन ने आदतन भविष्य की ओर भागना चाहा, किसी नए डर, किसी नए सहारे की तरफ। पर वो भाग नहीं पाया। जैसे थक कर बैठ गया हो।अनाया ने महसूस किया कि अब उसे अपने अकेलेपन को बदलने की ज़रूरत नहीं है। न उसे भरने की, न सजाने की, न समझाने की।बस रहने की।जैसे सांस रहती है।जैसे धड़कन रहती है।जैसे रात रहती है।और उसी रात के भीतर, बिना किसी घोषणा के, बिना किसी वादे के, उसके जीवन का सबसे शांत दिन पूरा हुआ।

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