आध्यात्मिक यात्रा के अंतिम चरणों में साधक के सामने एक बहुत सूक्ष्म लेकिन गहरा विषय आता है — समर्पण। सत्ताईसवें अध्याय में सुमन किशोर यही प्रश्न सत्यदर्शी जी के सामने रखते हैं कि समर्पण वास्तव में क्या है और इसे कैसे समझा जाए।सत्यदर्शी जी बताते हैं कि समर्पण कोई बाहरी क्रिया नहीं है, बल्कि एक आंतरिक स्थिति है। जब साधक लंबे समय तक खोज, प्रयास और संघर्ष करता है, तब एक क्षण ऐसा आता है जब वह देखता है कि उसकी सारी कोशिशें सीमित हैं। उसी क्षण भीतर एक ढीलापन आता है — और वहीं से समर्पण का जन्म होता है।वे कहते हैं कि समर्पण का अनुभव ऐसा होता है जैसे वर्षों का बोझ एक पल में उतर गया हो। साधक के भीतर जो निरंतर खोज, चिंता और पाने की आकांक्षा थी, वह अचानक शांत हो जाती है। अब उसके मन में यह प्रश्न नहीं रहता कि मुक्ति कब मिलेगी या आत्मा का अनुभव कब होगा। उसे भीतर से यह अनुभव होने लगता है कि सब कुछ पहले से ही पूर्ण है, सब कुछ उसी परम सत्य में घटित हो रहा है।सत्यदर्शी जी इस अवस्था को बहुत सुंदर उदाहरण से समझाते हैं —जैसे एक शिशु माँ की गोद में निश्चिंत होकर सो जाता है, उसे किसी प्रकार की चिंता नहीं होती। ठीक वैसे ही जब साधक समर्पण में आता है, तो उसके भीतर पूर्ण विश्वास जन्म लेता है कि जो हो रहा है वही सही है, वही पूर्ण है। यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण बात आती है।सुमन किशोर पूछते हैं — क्या समर्पण का अर्थ कर्म छोड़ देना है?सत्यदर्शी जी स्पष्ट करते हैं कि ऐसा नहीं है। समर्पण का अर्थ यह नहीं कि जीवन के कार्यों से भाग जाओ। बल्कि इसका अर्थ है — कर्ता होने के अहंकार को छोड़ देना।कर्म तो चलते रहते हैं, जीवन अपनी गति से बहता रहता है, लेकिन अब भीतर “मैं कर रहा हूँ” का भाव समाप्त होने लगता है।यहीं से वास्तविक स्वतंत्रता शुरू होती है।सत्यदर्शी जी आगे बताते हैं कि जब समर्पण गहरा होता है, तब साधक का दृष्टिकोण पूरी तरह बदल जाता है। अब वह जीवन को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं करता। वह देखता है कि जीवन अपने आप घटित हो रहा है — जैसे नदी स्वयं बहती है।इस अवस्था में साधक का मन हल्का हो जाता है।अब न भविष्य की चिंता रहती है, न परिणाम की पकड़। वह जो भी करता है, सहजता से करता है। और जो भी होता है, उसे स्वीकार करता है।यही समर्पण है।सत्ताईसवें अध्याय का मूल संदेश यही है —जब तक “मैं” पकड़कर बैठा है, तब तक संघर्ष है।जैसे ही “मैं” ढीला पड़ता है, समर्पण घटित होता है।और जब समर्पण पूर्ण हो जाता है, तब साधक को यह अनुभव होता है कि वह कभी अलग था ही नहीं। वह हमेशा से उसी परम चेतना का हिस्सा था।