बाईसवें अध्याय में सुमन किशोर एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछते हैं — समर्पण क्या है और इसे कैसे जिया जाए?सत्यदर्शी जी बताते हैं कि समर्पण कोई बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि भीतर की एक गहरी अवस्था है। जब साधक अपने नियंत्रण, अपने “मैं करता हूँ” वाले भाव को छोड़ देता है, तब समर्पण शुरू होता है।वे समझाते हैं कि समर्पण का अनुभव ऐसा होता है जैसे वर्षों का बोझ एक ही क्षण में उतर जाए। भीतर एक हल्कापन, एक शांति और एक गहरा विश्वास जन्म लेता है कि —👉 जो हो रहा है, वही सही है👉 जीवन अपने आप चल रहा है इस अवस्था में साधक भविष्य की चिंता छोड़ देता है — उसे यह जानने की जरूरत नहीं रहती कि मुक्ति कब मिलेगी या क्या होगा। वह वर्तमान में ही संतुष्ट हो जाता है।सत्यदर्शी जी एक सुंदर उदाहरण देते हैं —जैसे एक छोटा बच्चा माँ की गोद में निश्चिंत होकर सो जाता है, वैसे ही समर्पण में साधक परम सत्ता पर पूर्ण भरोसा कर लेता है।लेकिन वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि समर्पण का अर्थ कर्म छोड़ देना नहीं है।जीवन चलता रहता है — काम, संबंध, जिम्मेदारियाँ सब रहती हैं —पर फर्क यह आता है कि अब साधक भीतर से तनावमुक्त रहता है।अब वह “मैं कर रहा हूँ” की जगह “सब अपने आप हो रहा है” के भाव में जीता है।धीरे-धीरे यह समर्पण साधक को गहरी शांति, विश्वास और आनंद में स्थापित कर देता है।सार👉 समर्पण हारना नहीं, बल्कि अहंकार को छोड़ना है👉 जब “मैं” हटता है, तभी शांति आती है👉 जीवन को नियंत्रित करने की जरूरत नहीं, उसे होने देना ही समर्पण हैऔर यहीं से साधक के भीतर एक ऐसी सहजता जन्म लेती है, जहाँ जीवन बोझ नहीं बल्कि एक सहज प्रवाह बन जाता है।