तीसरा अध्याय (मन और साक्षी का भेद”)
सुमन किशोर:गुरुदेव, अब मुझे यह समझ में आने लगा है कि मैं शरीर या नाम नहीं हूँ, बल्कि साक्षी हूँलेकिन एक समस्या अभी भी है — मेरा मन बहुत चंचल है।कभी शांति होती है, तो कभी अचानक विचारों का तूफान उठ जाता है।क्या यह मन ही मुझे सच्चे अनुभव से दूर रखता है?सत्यदर्शी जी:सुमन, मन … Read more