तेरहवाँ अध्याय: “मौन की परिपक्वता” — जब जानना भी छोड़ दिया जाता है

दोस्तों, सत्यदर्शी जी की पुस्तक का तेरहवाँ अध्याय एक बहुत सूक्ष्म और गहरा मोड़ है।अगर बारहवें अध्याय में “स्वयं में स्थित होना” था,तो तेरहवें अध्याय में उस स्थिति की परिपक्वता है।यहाँ साधक केवल साक्षी में टिकता ही नहीं,बल्कि जानने वाले भाव को भी छोड़ देता है।ज्ञान से परे की अवस्थासत्यदर्शी जी बताते हैं कि शुरुआत … Read more