पंद्रहवाँ अध्याय: “मैं ही वह हूँ” — खोज का अंतिम उद्घाटन

दोस्तों, सत्यदर्शी जी की पुस्तक का पंद्रहवाँ अध्याय किसी उपलब्धि का उत्सव नहीं है, बल्कि एक गहरी पहचान का उद्घाटन है।पूरी पुस्तक में एक प्रश्न बार-बार उभरता रहा —“मैं कौन हूँ?”साधना हुई, अभ्यास हुआ, साक्षीभाव में टिकना सीखा, अहंकार की परतें ढीली हुईं, अद्वैत की झलक मिली —और अब पंद्रहवें अध्याय में सत्यदर्शी जी उस … Read more