चौदहवाँ अध्याय: “अद्वैत का अनुभव” — जब सब कुछ एक हो जाता है

दोस्तों, सत्यदर्शी जी की पुस्तक का चौदहवाँ अध्याय आध्यात्मिक यात्रा की पराकाष्ठा है।अगर पहले अध्याय में प्रश्न था — “मैं कौन हूँ?”और बीच के अध्यायों में साधना, साक्षीभाव और आत्मस्थित अवस्था थी —तो चौदहवें अध्याय में वह अंतिम अनुभूति आती है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है।अलगाव का भ्रम टूटता हैसत्यदर्शी जी बताते हैं कि … Read more