अट्ठाईसवाँ अध्याय — प्रेम और अद्वैत की अनुभूतिसत्यदर्शी जी की दृष्टि

इस अध्याय में सत्यदर्शी जी साधक को एक गहरे सूत्र की ओर ले जाते हैं —“जो सामने है, वह मैं ही हूँ।” यही दृष्टि प्रेम को बदल देती है।सामान्यतः मनुष्य का प्रेम अपेक्षाओं से भरा होता है। वह प्रेम करता है, लेकिन बदले में कुछ चाहता है। इसी कारण वह प्रेम बंधन बन जाता है।जब साधक यह देखता है कि सामने वाला भी उसी चेतना का रूप है जो उसके भीतर है, तब प्रेम का स्वरूप बदल जाता है। अब प्रेम बिना कारण और बिना अपेक्षा के बहता है।ऐसा प्रेम ही मुक्ति का द्वार बनता है। धीरे-धीरे यह समझ इतनी गहरी हो जाती है कि साधक के लिए कोई “दूसरा” नहीं बचता। जब दूसरा नहीं है, तो नफ़रत भी समाप्त हो जाती है।यहीं अद्वैत का अनुभव प्रकट होता है।अब साधक का प्रेम उसकी अवस्था बन जाता है। वह हर परिस्थिति में, हर व्यक्ति में उसी एक चेतना को देखता है। इसलिए उसका प्रेम स्थिर रहता है, न बदलता है, न टूटता है।इस अवस्था में प्रेम केवल भाव नहीं रहता, बल्कि परम सत्य का अनुभव बन जाता है।अट्ठाईसवें अध्याय का सार यही है कि जब “मैं” और “तुम” का भेद मिट जाता है, तब प्रेम अपने शुद्धतम रूप में प्रकट होता है, और वही प्रेम परमात्मा का साक्षात्कार बन जाता है।

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