आध्यात्मिक यात्रा के गहरे चरणों में साधक के सामने एक ऐसा अनुभव आता है जिसे शब्दों में समझाना कठिन होता है। इस अवस्था को सत्यदर्शी जी “शून्यता” के रूप में समझाते हैं। तेइसवें अध्याय में सुमन किशोर इसी शून्यता के अर्थ को समझना चाहते हैं, क्योंकि मन सामान्यतः शून्यता को खालीपन या नष्ट हो जाने की अवस्था मान लेता है।सत्यदर्शी जी स्पष्ट करते हैं कि यह शून्यता वैसी नहीं है जैसा मन सोचता है। मन जब “शून्य” शब्द सुनता है तो डर जाता है, क्योंकि उसे लगता है कि सब कुछ समाप्त हो गया। लेकिन वास्तविकता यह है कि यह शून्यता विनाश नहीं बल्कि अस्तित्व का मूल स्रोत है। वे बताते हैं कि यही वह आधार है जिससे पूरा ब्रह्मांड प्रकट होता है। तारे, आकाशगंगाएँ, पर्वत, नदियाँ, पेड़, प्राणी — सब उसी शून्यता से प्रकट होते हैं और अंततः उसी में विलीन हो जाते हैं। इस प्रकार शून्यता वास्तव में खाली नहीं है, बल्कि इतनी पूर्ण है कि उसमें कुछ जोड़ने की आवश्यकता ही नहीं रहती। सत्यदर्शी जी के अनुसार जब साधक अपने भीतर गहराई से उतरता है, तब वह इस शून्यता का अनुभव करता है। यह अनुभव विचारों से नहीं होता, बल्कि मौन में घटित होता है। उस क्षण मन की सारी धारणाएँ और पहचानें धीरे-धीरे गिरने लगती हैं।इस अवस्था में साधक देखता है कि जो कुछ वह अब तक “मैं” मानता था — जैसे शरीर, मन, भावनाएँ और अहंकार — वे सब अस्थायी हैं। इन सबके पीछे एक गहरी शांति है, एक ऐसी उपस्थिति जो न बदलती है और न समाप्त होती है।यही शून्यता है।सत्यदर्शी जी बताते हैं कि इस अनुभव में भय का कोई स्थान नहीं होता। उल्टा, इस शून्यता में प्रवेश करते ही साधक पहली बार सच्ची पूर्णता का अनुभव करता है। उसे लगता है जैसे वह अपने वास्तविक घर लौट आया हो।इस अनुभव के बाद जीवन के प्रति उसकी दृष्टि बदल जाती है। पहले वह हर अनुभव से अपनी पहचान जोड़ लेता था, लेकिन अब वह देखता है कि जीवन की घटनाएँ आती-जाती रहती हैं, जबकि भीतर की शांति अचल रहती है।तेइसवें अध्याय का मूल संदेश यही है —शून्यता कोई नकारात्मक अवस्था नहीं है, बल्कि वही अस्तित्व की पूर्णता है।जब साधक इस शून्यता को पहचान लेता है, तब उसे समझ आता है कि जीवन की सारी खोज उसी पूर्णता को पाने की थी जो पहले से ही उसके भीतर उपस्थित थी।