बाईसवें अध्याय में सत्यदर्शी जी साधक को एक ऐसी अवस्था की ओर ले जाते हैं जहाँ प्रयास समाप्त होने लगता है और जीवन एक सहज प्रवाह में बदलने लगता है। सुमन किशोर का प्रश्न यहाँ बहुत महत्वपूर्ण है — जब साधक समझ लेता है कि वह साक्षी है, तब आगे क्या करना शेष रहता है?सत्यदर्शी जी बताते हैं कि इस अवस्था के बाद अगला कदम है — समर्पण। लेकिन यह समर्पण कोई बाहरी क्रिया नहीं है, न ही किसी के सामने झुकने का नाम है। यह भीतर की एक गहरी समझ है, जहाँ साधक “मैं करता हूँ” की भावना को छोड़ देता है।समर्पण का अनुभव अत्यंत सूक्ष्म और गहरा होता है। ऐसा लगता है जैसे वर्षों से उठा हुआ बोझ अचानक उतर गया हो। मन की चिंता, भविष्य की बेचैनी और परिणामों का दबाव धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। साधक के भीतर एक गहरा विश्वास जन्म लेता है कि जो कुछ भी हो रहा है, वही सही है, वही पूर्ण है। सत्यदर्शी जी इस अवस्था को एक सुंदर उदाहरण से स्पष्ट करते हैं — जैसे एक छोटा बच्चा अपनी माँ की गोद में निश्चिंत होकर सो जाता है। उसे न भविष्य की चिंता होती है, न किसी भय का अनुभव। ठीक वैसे ही समर्पण में साधक जीवन के प्रति पूर्ण विश्वास में स्थापित हो जाता है।यहाँ एक महत्वपूर्ण भ्रम भी दूर किया जाता है। समर्पण का अर्थ यह नहीं है कि साधक अपने कर्मों को छोड़ दे या निष्क्रिय हो जाए। जीवन पहले की तरह चलता रहता है — कार्य होते हैं, संबंध निभते हैं, जिम्मेदारियाँ पूरी होती हैं। लेकिन अंतर यह आता है कि अब साधक भीतर से बोझमुक्त होता है।पहले वह हर कार्य को अपने प्रयास और नियंत्रण से जोड़ता था, अब उसे अनुभव होता है कि सब कुछ अपने आप घट रहा है। यह समझ उसे भीतर से हल्का कर देती है।समर्पण के साथ ही साधक के भीतर संघर्ष समाप्त होने लगता है। अब वह जीवन से लड़ता नहीं, बल्कि उसे स्वीकार करता है। यह स्वीकार मजबूरी से नहीं, बल्कि गहरी समझ से उत्पन्न होता है।धीरे-धीरे यह समर्पण साधक के जीवन को पूरी तरह बदल देता है। चिंता की जगह विश्वास आ जाता है, भय की जगह शांति और असंतोष की जगह संतोष।इस प्रकार, बाईसवाँ अध्याय यह संकेत देता है कि आध्यात्मिक यात्रा का सार केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि उस ज्ञान में पूरी तरह विश्राम करना है। जब साधक अपने “मैं” को छोड़ देता है और जीवन को जैसा है वैसा स्वीकार कर लेता है, तभी वास्तविक समर्पण घटित होता है — और उसी में सच्ची शांति का अनुभव संभव होता है।