सत्यदर्शी जी इस अध्याय में मनुष्य के जीवन के सबसे गहरे और सार्वभौमिक अनुभव — दुख — की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। सुमन किशोर का प्रश्न सरल है, लेकिन उसके भीतर पूरी आध्यात्मिक खोज छिपी हुई है: यदि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शुद्ध आत्मा है, तो फिर उसे दुख क्यों होता है?सत्यदर्शी जी इस प्रश्न का उत्तर देते हुए एक मूलभूत सत्य को सामने रखते हैं — दुख आत्मा को नहीं होता, बल्कि मन और अहंकार को होता है। मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यही है कि वह अपने को शरीर, मन और अहंकार के साथ जोड़ लेता है, और उसी पहचान में जीने लगता है। यही गलत पहचान दुख का कारण बनती है।जब कोई व्यक्ति अपमानित होता है, तो वास्तव में चोट शरीर को नहीं लगती, बल्कि अहंकार को लगती है। जब इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं, तो बेचैनी आत्मा में नहीं, बल्कि मन में उत्पन्न होती है। लेकिन चूँकि मनुष्य इन दोनों को ही अपना “मैं” मान बैठा है, इसलिए हर अनुभव उसे व्यक्तिगत लगने लगता है।सत्यदर्शी जी इस स्थिति को समझाने के लिए सरल उदाहरणों का सहारा लेते हैं। जैसे एक बच्चा मिट्टी का घर बनाता है और उसके टूट जाने पर रोने लगता है, क्योंकि वह उसे वास्तविक मान बैठा है। लेकिन एक समझदार व्यक्ति जानता है कि वह केवल खेल है। उसी प्रकार मनुष्य अपने विचारों, भावनाओं और अहंकार को वास्तविक मान लेता है, और उनके बदलने पर दुखी होता है।इस अध्याय में यह भी स्पष्ट किया गया है कि आत्मा का स्वभाव बिल्कुल भिन्न है। आत्मा आकाश के समान है — व्यापक, अडोल और अछूती। जैसे आकाश में बादल आते-जाते हैं, लेकिन आकाश पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वैसे ही सुख और दुख मन में आते-जाते हैं, पर आत्मा हमेशा शांत और स्थिर रहती है।सत्यदर्शी जी साधक को एक सरल लेकिन अत्यंत प्रभावशाली अभ्यास की ओर संकेत करते हैं — हर अनुभव के क्षण में स्वयं से पूछना: “यह किसे हो रहा है?” जब यह प्रश्न ईमानदारी से पूछा जाता है, तो धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगता है कि दुख मन को हो रहा है, चोट अहंकार को लग रही है, लेकिन भीतर एक साक्षी है जो केवल देख रहा है।यहीं से मुक्ति की शुरुआत होती है।जब साधक इस भेद को समझकर उसे जीना शुरू करता है, तो दुख की पकड़ ढीली पड़ने लगती है। घटनाएँ वैसी ही रहती हैं, लेकिन उनका प्रभाव बदल जाता है। धीरे-धीरे एक ऐसी स्थिति आती है जहाँ दुख आता तो है, पर भीतर तक पहुँच नहीं पाता।इस प्रकार, इक्कीसवाँ अध्याय यह सिखाता है कि दुख से लड़ना या उसे समाप्त करना आवश्यक नहीं है, बल्कि उसकी वास्तविकता को समझना आवश्यक है। जैसे ही यह समझ स्पष्ट होती है कि “मैं मन और अहंकार नहीं, बल्कि साक्षी चेतना हूँ”, उसी क्षण दुख का प्रभाव कम होने लगता है।अंततः साधक इस सत्य को पहचान लेता है कि दुख कभी उसका था ही नहीं। वह हमेशा से शुद्ध, शांत और मुक्त चेतना था — केवल पहचान की भूल ने उसे बंधन में रखा हुआ था।