अठारहवाँ अध्याय: अस्तित्व में विलय (जहाँ साधक भी मिट जाता है)

दोस्तों, सत्यदर्शी जी की पुस्तक का अठारहवाँ अध्याय आध्यात्मिक यात्रा की अंतिम पराकाष्ठा को दर्शाता है —एक ऐसी अवस्था, जहाँ साधक, साधना और लक्ष्य तीनों ही समाप्त हो जाते हैं।सत्रहवें अध्याय में हमने साक्षीभाव को समझा, जहाँ व्यक्ति देखने वाला बन जाता है।लेकिन इस अध्याय में सत्यदर्शी जी बताते हैं कि साक्षीभाव की भी एक … Read more