अठारहवाँ अध्याय: “पूर्ण स्वतंत्रता”- जब भीतर कोई बंधन नहीं रहता
दोस्तों, सत्यदर्शी जी की पुस्तक का अठारहवाँ अध्याय आध्यात्मिक यात्रा के उस चरण को दर्शाता है जहाँ साधक भीतर से वास्तव में स्वतंत्र होने लगता है।पूरी पुस्तक में हमने यह समझा कि मनुष्य का असली स्वरूप शरीर या मन नहीं है, बल्कि शुद्ध चेतना है। लेकिन इस सत्य को केवल समझना ही पर्याप्त नहीं है। … Read more