ग्यारहवाँ अध्याय: करुणा का प्रवाह ( जब अस्तित्व दूसरों में भी दिखने लगता है)

दोस्तों, सत्यदर्शी जी की पुस्तक “जिसकी तलाश में मैं भटका, वो मैं ही था” का ग्यारहवाँ अध्याय उस सुंदर अवस्था को प्रकट करता है, जहाँ साधक का अनुभव केवल उसके भीतर सीमित नहीं रहता,बल्कि वह दूसरों तक बहने लगता है।दसवें अध्याय में हमने “दिव्य जीवन” को समझा,अब इस अध्याय में सत्यदर्शी जी बताते हैं —👉 … Read more