बाईसवाँ अध्याय — समर्पण का गहरा अर्थ

बाईसवें अध्याय में सत्यदर्शी जी साधक को एक ऐसी अवस्था की ओर ले जाते हैं जहाँ प्रयास समाप्त होने लगता है और जीवन एक सहज प्रवाह में बदलने लगता है। सुमन किशोर का प्रश्न यहाँ बहुत महत्वपूर्ण है — जब साधक समझ लेता है कि वह साक्षी है, तब आगे क्या करना शेष रहता है?सत्यदर्शी … Read more