सच्चे ‘मैं’ की पहचान — सत्यदर्शी जी की दृष्टि

आध्यात्मिक यात्रा का सबसे सूक्ष्म और कठिन मोड़ वह है जहाँ इंसान को अपने ही “मैं” पर संदेह होने लगता है। तीसरे अध्याय में सत्यदर्शी जी इसी बिंदु को पकड़ते हैं — वह “मैं” जो हर वाक्य में बोलता है, क्या वही असली मैं है?हम दिन भर कहते रहते हैं —“मैं दुखी हूँ।”“मैं खुश हूँ।”“मैं … Read more