अट्ठाईसवाँ अध्याय — प्रेम और अद्वैत की अनुभूतिसत्यदर्शी जी की दृष्टि
इस अध्याय में सत्यदर्शी जी साधक को एक गहरे सूत्र की ओर ले जाते हैं —“जो सामने है, वह मैं ही हूँ।” यही दृष्टि प्रेम को बदल देती है।सामान्यतः मनुष्य का प्रेम अपेक्षाओं से भरा होता है। वह प्रेम करता है, लेकिन बदले में कुछ चाहता है। इसी कारण वह प्रेम बंधन बन जाता है।जब … Read more